संक्षिप्त ०७: क्या पार्टी राजनीति जातीय कोटा को कमजोर बनाती हैं?

इस अध्ययन में यह एक प्राकृतिक प्रयोग और भारत के गांव परिषदों के लिए जातीय कोटा की जांच के लिए एक सर्वेक्षण प्रयोग का उपयोग करता है।

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Category: Elections, Public Service Provision

Date of Publication: Friday, February 1, 2013

EGAP Researcher: Thad Dunning

Other Authors: Janhavi Nilekani

PDF: BRIEF-07-India-Dunning-Nilekani.pdf

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Geographical Region: Asia

Research Question:

Do ethnic quotas in village councils increase the likelihood that local politicians will represent the interests of disadvantaged groups? Can partisan politics outweigh the beneficial impact of quotas for disadvantaged ethnic groups?

Preparer: Jacob Kopas

Hindi

पृष्ठभूमि:

 

पृष्ठभूमि ऐतिहासिक भेदभाव को बदलने के एक महत्वाकांक्षी प्रयास में, भारत के १९९३ के संवैधानिक  संशोधन के आदेशानुसार, ग्राम परिषदें समय- समय पर सुविधावंचित समूहों ( अनुसूचित जाति एवं जनजातियों ) के प्रतिनिधियों के लिए सीटें आरक्षित करेंगी. यह अवधारणा चट्टोपाध्याय व डफ्लो (२००४,प- १४११) की शोध के परिणाम द्वारा भी समर्थित थी कि चुनाव में ‘आरक्षण’ नीति चयन को प्रभावित करता है. यह जातीय कोटा सुविधावंचित जाति एवं जनजातियों को स्थानीय राजनीति  में मुखर आवाज़ भी देगा, साथ ही ग्रामीण स्तर पर नीति निर्धारण में उनकी रूचि भी बढाएगा. २००३ में हुई  रोहिणी पांडे की शोध द्वारा भी इसी तथ्य का प्रतिपादन हुआ. चूंकि ग्राम परिषदें अक्सर राज्य और संघीय कल्याण योजनाओं के लाभ व नौकरियों का  वितरण करती हैं , तो जातीय  कोटा, जातियों के बीच पाए जाने वाले विकास के संकेत जैसे – गरीबी स्तर , साक्षरता रेट एवं प्राथमिक सेवाओं तक पहुँचने  में आने वाली असमानताओं को दूर करेंगे. 

तीन प्रदेशों – कर्नाटक, राजस्थान एवं बिहार में किये गए कल्याणकारी लाभों के वितरण सम्बन्धित  शोध एवं सर्वेक्षण अपनी जांच द्वारा  प्रमाण देखते हैं कि क्या जातीय कोटा   भारत में सुविधावंचित जाति एवं जनजातियों के कल्याण के प्रति रूचि बढाता है? जबकि पिछले शोध ने कुछ प्रमाण दिए थे कि कोटा द्वारा इन समूहों के लाभ में वृद्धि होती है,  कुछ बेतरतीब प्रयोगों ने इनके पक्ष में ठोस सबूत भी पेश किये थे. इसके साथ ही ,लेखकों ने इस पर भी ध्यान दिया था कि पार्टीगत राजनीति  जातीय कोटा के लाभदायी प्रभाव को कैसे बदल व अंततः कम भी कर सकती है. हालांकि भारत के बहुत से राज्य स्थानीय चुनावों में पार्टी की सम्बद्धता पर प्रतिबन्ध लगाते हैं,परन्तु राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियाँ वित्त पोषण (funding) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इस सर्वेक्षण के ७०% उत्तरदाता आसानी से अपनी ग्राम परिषद के अध्यक्ष की राजनैतिक पार्टी बता सकते हैं. बहुत सी राजनैतिक पार्टियाँ तो कई जातियों को इकठ्ठा करके इसलिए  गठबंधन बनाती हैं, ताकि  आगे चलकर स्थानीय राजनीतिज्ञ अपनी जाति के सदस्यों के बजाय पार्टी के हित में  कामों के लिए प्रोत्साहित हों.


Research Design::

इस शोध में जातीय कोटा के प्रभाव को जांचने के लिए दो अलग अलग शोध डिज़ाइनों का प्रयोग किया गया. पहले में शोधकर्ता कोटा प्रणाली की विशेषताओं का लाभ लेकर तथाकथित ‘प्राक्रतिक प्रयोग’ करता है. गाँव सुविधावंचित जातियों के लिए बारी बारी से सीटों का आरक्षण करते हैं, और प्रत्येक चुनावी चक्र में कुछ गांवों के जोड़ों को कोटा में चुने जाने व न चुने जाने के अनियमित मौके मिल सकते हैं. चूंकि यह ‘प्राक्रतिक प्रयोग’ सही  अर्थों में क्षेत्र प्रयोग नहीं है, अतः शोधकर्ता यह प्रमाणित करते हैं कि यह तकनीक  बेतरतीब या क्रम रहित प्रयोग के निकट आती है. इसके लेखकों ने ग्रामीणों , परिषद सदस्यों एवं स्थानीय सरकारी कर्मचारियों का सर्वेक्षण किया यह जानने के लिए कि क्या कोटा से कल्याण सेवाओं और नौकरी कार्यक्रमों तक लोगों के पहुँचने में बढ़ोतरी हुई है अथवा नहीं. इस शोध में  कल्याण कार्यक्रमों में किये गए वास्तविक खर्च का वर्ल्ड बैंक द्वारा प्रायोजित ऑडिट की रिपोर्ट का भी उपयोग हुआ है.

इसके बाद लेखकों ने एक सर्वेक्षण प्रयोग यह जानने के लिए किया कि क्या पार्टी राजनीति अथवा जातीय पहचान इस बात को प्रभावित करती है कि कल्याण लाभ किसे  मिले. इस  सर्वेक्षण में शोधकर्ता ने  परिषद के अध्यक्ष के रूप में एक काल्पनिक प्रत्याशी का प्रचार भाषण पढ़ा. हर भाषण में उस कल्पित राजनीतिज्ञ की जाति और पार्टी को बेतरतीब क्रम में स्तुत किया. बाद में लेखकों ने गांववालों  से पूछा कि वे इस प्रत्याशी को  वोट देंगे या नहीं, और क्या वे इस प्रत्याशी से उसके जीतने पर नौकरी व अन्य लाभ कि आशा करेंगे?  गांववालों के उत्तर से शोधकर्ताओं को जाति की समान पृष्ठभूमि और समान राजनैतिक पार्टी की सदस्यता के प्रभाव को जांचने का मौका मिला. हालाँकि यह दूसरा प्रयोग केवल गांववालों को लाभ मिलने  की आशा की जांच करता है ( वास्तविक लाभ की जांच नहीं करता). लेकिन यह राजनैतिक पार्टी और जातीय समूह  की  पहचान के  तुलनात्मक प्रभाव  के सम्बन्ध में सशक्त प्रमाण ज़रूर देता है.

 

टेबल १- लाभ एवम कल्याणकारी कार्यक्रमों पर ग्रामीण परिषद कोटा के अनुमानित औसत प्रभाव

सर्वेक्षण परिणाम(सुविधावंचित जातियों)

अनुमानित प्रभाव Stand. Dev. महत्व

परिषद से मिली नौकरी व लाभ का %

1.57 (3.62) नहीं

MGNREGA स्कीम  द्वारा मिली नौकरी का %

3.39 (3.67) नहीं

सरकारी स्कीम द्वारा मिले  लाभ  का %

3.28 (6.27) नहीं
       

कल्याणकारी कार्यक्रमों के खर्च के परिणाम (रुपयों में)

अनुमानित प्रभाव Stand. Dev. महत्व
आचार्य स्कीम -89,892.7 (-86,063.7) नहीं
IAY स्कीम -15,095.7 (87,357.1) नहीं

आंबेडकर हाउसिंग स्कीम

-31,681.4 (28,580.8) नहीं
MGNREGA स्कीम 39,305.7 (212,448.3) नहीं
 
शोध परिणाम::

जातीय कोटा के समर्थकों की बड़ी आशाओं के बावजूद इस शोध में जातीय कोटा का ग्राम परिषद नीतियों पर कोई विशेष प्रभाव प्रमाणित नहीं होता है. औसतन भी देखें तो परिषद अध्यक्ष के कोटा का  सुविधावंचित जातियों के ग्रामीणों के नौकरी व अन्य लाभ मिलने पर कोई खास  प्रभाव नहीं दीखता. यहाँ तक कि वास्तविक खर्च के डाटा को देखकर भी शोध में विधावंचित जातियों के लिए बनाये विशेष कल्याण कार्यक्रमों में कोई खास फर्क नहीं नज़र आता है. फिर भी, शोधकर्ता को कुछ प्रमाण इस बात के अवश्य मिले कि परिषद अध्यक्ष की राजनैतिक पार्टी की सदस्यता के कारण  नौकरी मिलने व लाभ की दर ३०% तक बढ़ सकती है. सर्वेक्षण प्रयोग के परिणाम नौकरी व लाभों के वितरण पर राजनैतिक पार्टियों के सम्भावित प्रभाव पर रोशनी डालते हैं. पार्टी के संग्रहण पर नियंत्रण के बावजूद भी ग्रामीण लोग उस काल्पनिक प्रत्याशी को ज्यादा वोट देंगे, जो उन्हीं की पार्टी का सदस्य है, बजाय कि उसको जो उन्हीं की जाति का है. ग्रामीण भी अपनी जाति के  प्रत्याशी के बजाय उन्हीं की पार्टी  के प्रत्याशी से लाभों की आशा अधिक करेंगे. साथ ही यह भी पाया गया कि जब ग्रामीण लोग  प्रत्याशी से अलग जाति के हों, तो प्रत्याशी की राजनैतिक पार्टी का प्रभाव लाभ पाने की आशाओं में बढ़ोतरी कर देता है.

नीति निहितार्थ/ तात्पर्य:
  • यह शोध दर्शाता है कि जातीय कोटा कोई राम बाण दवा नहीं है, जिससे सुविधावंचित जातियों का प्रतिनिधित्व बढ़ सके. अन्य कारण- जैसे पार्टी राजनीति अभी भी  प्रादेशिक लाभों के वितरण और नीतियों को  लागू करने में स्थानीय निकायों  को निश्चित रूप से प्रभावित कर सकती  है.
  • राजनैतिक पार्टियाँ , विशेषत: उन क्षत्रों में जहाँ वे विभिन्न जातीय समूहों को एक साथ लाती हैं, राजनैतिक संग्रहण को प्रभावित करती हैं. अतः इससे स्थानीय राजनीति, जातीय कोटा से अधिक प्रभावी हो सकती है. नीति निर्माताओं को इन नीतियों के मूल्यांकन के समय यह बात ध्यान में ज़रूर रखनी चाहिए कि राजनैतिक पार्टियाँ जातीय कोटे के प्रभाव को किस तरह बदल सकती हैं.
  • फिर भी यह जानना महत्वपूर्ण है कि यह शोध यह नहीं दर्शाता कि जातीय कोटा प्रणाली का स्थानीय राजनीतिमें कुछ भी प्रभाव नहीं है. कोटा का सामाजिक राजनैतिक प्रभाव हो सकता है, भले ही उसका प्रादेशिक लाभों से सीधा सम्बन्ध न हो.
  • यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि हालाँकि यह शोध प्रमाणित करता है कि  भारत में जातीय कोटा सुविधावंचित जातियों में असमानता को कम करने में कुछ खास प्रभावी नहीं है, परन्तु  यह शोध भारत की कोटा प्रणाली के सम्पूर्ण प्रभाव की जांच नहीं करता. इसके बजाय वह एक विशिष्ट चुनाव चक्र के दौरान ग्रामीण कोटा के  विशिष्ट प्रभावों पर ही ध्यान केन्द्रित करता है. इसीलिए यह पूर्ण रूप से कोटा नीति के व्यापक और समग्र प्रभाव की जांच नहीं करता.

References

Duflo and Chattopadhyay. 2004. Women As Policy Makers: Evidence From A Randomized Policy Experiment In India. Econometrica, September. 72(5) 1409–1443. Available at: http://poverty-action.org/sites/default/files/women%20policymakers.pdf

Pande. 2004. Can Mandated Political Representation Increase PolicyInfluence for Disadvantaged Minorities? Theory and Evidence from India. BREAD Working Paper No. 024, April. Available at: http://www.hks.harvard.edu/fs/rpande/papers/bread_02412.pdf